मुश्कान
मन की ब्यथा मन ही रहे,
कहे दुगुना होए,
सुख को साझा जब करें,
सुख चौगुना होए।
सुख आवे सब बिहुंसि उठे,
दु:ख में क्यों सब रोए,
फल अर्जित वही पाए रहे,
जो निज खेतन बोए।
दिवस हीर सन होत हैं,
मत खो दिन नित् रोए,
पाप- पुण्य जो भी करे,
गट्ठर पीठहि होए।
जो जन सतत् अनीति करे,
नीति न उन्हें सोहाए,
निस्चित अपने कर्म से,
उत्तम दिवस गॅवाए।
न्यायाधीश उपर बसे,
निज- कारज में तल्लीन,
नजरों से कोई बचे नहीं,
सजा मिले गिन- गिन।
ईश के श्रीमत पर जो चलें,
करे अमिय रस-पान,
बिन याचन निस्चित मिले,
अधरों पर मुश्कान, अधरों पर मु्स्कान।

