जीतेन्द्र प्रसाद कारण रचित कविता फिर आया है नया साल

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फिर आया है नया साल

फिर आया है नया साल ,
धनी-मनी को मालामाल ,
दीन-दुखियों को और कंगाल,
धीमी धीमी मंथर चाल , फिर आया है नया साल।

मंहगाई की त्वरित चाल,
करती निर्धन को बेहाल,
जिंदा रहने को ही खाता ,
सालो पिचका रहता गाल, फिर आया है नया साल ।

आतंकवाद और उग्रवाद का,
फैला रहता महा जाल,
रोक न पाया अब तक उसको,
गलती नहीं किसीकी दाल, फिर आया है नया साल ।

मतलब के हैं सब दिवाने,
तरह-तरह के हैं अफसाने,
सगे- सम्बन्धी बने पराये,
बात-बात पर करे बबाल , फिर आया है नया साल।

ब्याधि-बीमारी खूब पनपती,
रहती डाॅक्टर की ही चलती,
समय की निष्ठुरता मत पूछो,
कदम-कदम पर करे सवाल, फिर आया है नया साल

नव वर्ष लाए हर्ष अपार,
बढ़े सदा सबका ब्यापार,
मुद्दई बांका करे न बाल,
रखेंगे रब सबका ख्याल, फिर आया है नया साल।
रखेंगे रब सबका ख्याल, फिर आया है नया साल।

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