युवा दिवस पर गजेंद्र सिंह की रचना धूप और छांव

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युवा दिवस पर विशेष

धूप और छावँ
आज थोड़ा कोर्ट में फुर्सत के पल में, बैठकर धूप का आनंद ले रहा था। इस भरी कनकनी में अगर तिखा धूप मिल जाय तो आनंद ही आनंद महसूस होता है।
लेकिन, अनायास ही मेरे ख़्याल में एक बात आया कि यही धूप गर्मी के दिन में बर्दास्त नहीं होता है। परंतु, अभी जब ठंढ का दिन है, तो वही धूप अभी आनंद प्रदान कर रहा है।
मेरी इसी आंतरिक अनुभव ने मुझे,मेरे जीवन के बीते हुए पल में पहुंचा दिया।
मैं सोंचने लगा कि जब मैं बच्चा था तो मेरे पिता जी कई बातों पर मुझपर गुस्सा हो जाते थे। उस समय उनका गुस्सा होना या समझाना मुझे बहुत बुरा लगता था।
लेकिन, पता नहीं क्यों, उनके द्वारा डाँट कर समझाई गई हर बातें मुझे आज पूर्ण रूप से सत्य व सटीक लग रहा है।
वे उस समय यही तो बोलते थे कि “बेटा तुम अपने स्वास्थ पर ध्यान दो। बेटा तुम पढाई पर ध्यान दो। बेटा तुम अपने अंदर अच्छी संस्कार डालो।
उनकी वही बातें उस समय जो तीखे धूप के तरह उस वक्त मुझे जला देता था। आज उनकी वही बातें छावँ के तरह शीतलता की अनुभूति करवा रहा है।
आज का प्राप्त मेरा यह अनुभव शायद किसी युवा को यह समझने या समझाने में मदद कर सके कि आज आपके माता पिता की डाँट, कल आपके जीवन में शीतलता प्रदान कर जीवन को सुदृढ़ व सफल बनाने में कारगर साबित हो

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