जीतेन्द्र प्रसाद कारण रचित कविता फिर आया है नया साल
फिर आया है नया साल फिर आया है नया साल ,धनी-मनी को मालामाल ,दीन-दुखियों को और कंगाल,धीमी धीमी मंथर चाल , फिर आया है नया साल। मंहगाई की त्वरित चाल,करती निर्धन को बेहाल,जिंदा रहने को ही खाता ,सालो पिचका रहता गाल, फिर आया है नया साल । आतंकवाद और उग्रवाद का,फैला रहता महा जाल,रोक न […]
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